वायुसेना का गजराज 13 हजार फीट की ऊंचाई पर उतरा:दुनिया का सबसे ऊंचा एयरबेस, लद्दाख की यह जगह चीन सीमा से 23km दूर

Nov 07, 2026 - 16:40
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वायुसेना का गजराज 13 हजार फीट की ऊंचाई पर उतरा:दुनिया का सबसे ऊंचा एयरबेस, लद्दाख की यह जगह चीन सीमा से 23km दूर
भारतीय वायुसेना ने शनिवार को अपने भारी मालवाहक विमान IL-76MD की लद्दाख के न्योमा एयरबेस पर लैंडिंग करवाई। यह लैंडिंग 13,629 फीट की ऊंचाई पर हुई, जो दुनिया का सबसे ऊंचा एयरबेस है। IAF के मुताबिक, दुनिया में कहीं भी इस विमान की ये सबसे ऊंची लैंडिंग है। न्योमा, जिसे मुध-न्योमा भी कहते हैं, पूर्वी लद्दाख में है, चीन बॉर्डर से सिर्फ 23 KM दूर है। नवंबर 2025 में ही इसे अपग्रेड करके नया एयरबेस बनाया गया था, तब तत्कालीन एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने C-130J से उतरकर इसका उद्घाटन किया था। IAF के मुताबिक यह दुनिया का सबसे ऊंचा फाइटर-कैपेबल एयरफील्ड है। मतलब साफ है - अब भारत, चीन बॉर्डर के बिल्कुल पास भारी हथियार, गाड़ियां और बड़ी संख्या में सैनिक बहुत तेजी से पहुंचा सकता है। हालांकि, न्योमा पर पहले भी लैंडिंग हुई है। 20 अगस्त 2013 को C-130J ने वहां 16,614 फीट पर लैंड किया था, वो उस विमान का रिकॉर्ड था। लेकिन IL-76MD का ये रिकॉर्ड पहली बार बना है। दोनों अलग-अलग विमान हैं। लैंडिंग की 2 तस्वीरें… IL-76MD क्या है वायुसेना में इसे 'गजराज' कहते हैं। यह रूस में बना 4 इंजन वाला हैवी ट्रांसपोर्ट विमान है। करीब 40-50 टन तक माल उठा सकता है। सैनिक, टैंक, गाड़ियां, हथियार, राशन - सब कुछ ले जा सकता है। IL-76MD की लैंडिंग बड़ी उपलब्धि क्यों… 1. कम ऑक्सीजन और हवा का कम घनत्व: 13,629 फीट पर हवा पतली होती है। इससे विमान के इंजनों और पंखों की कार्यक्षमता प्रभावित होती है। टेकऑफ और लैंडिंग दोनों चुनौतीपूर्ण होते हैं। 2. भारी विमान को उतारने की चुनौती: IL-76MD करीब 40 टन तक सामान ले जा सकता है। इतने बड़े विमान को ऊंचाई वाले एयरफील्ड पर सुरक्षित उतारने के लिए विशेष गणना, सटीक नियंत्रण और पायलटों के अनुभव की जरूरत होती है। 3. सैन्य रणनीतिक महत्व: न्योमा लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा के करीब है। यहां भारी मालवाहक विमान उतरने से सैनिकों, सैन्य उपकरणों और जरूरी रसद की आवाजाही में मदद मिल सकती है। 1962 की जंग के बाद बंद था न्योमा एयरबेस न्योमा एयरबेस 13,710 फीट की ऊंचाई पर है और यह दुनिया के सबसे ऊंचे एयरबेस में से एक है। यह चीन की सीमा LAC से करीब 23 किलोमीटर दूर है और इसमें 2.7 किलोमीटर लंबा रनवे है। यह एयरबेस 1962 में शुरू हुआ था, लेकिन भारत-चीन युद्ध के बाद बंद कर दिया गया था। 2023 में इसे फिर से आधुनिक एयरबेस बनाने का काम शुरू हुआ और 12 नवंबर 2025 को इसे दोबारा खोला गया है। न्योमा एयरबेस पर पहले मिट्टी का रनवे था, जहां बारिश के दौरान कीचड़ हो जाता था। इसे सितंबर 2009 में दोबारा शुरू किया गया, जब वायुसेना के एएन-32 ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट ने यहां पहली बार लैंडिंग की थी। इसके बाद यह फिर बंद हो गया। सिंधु नदी के किनारे स्थित न्योमा, लेह से करीब 180 किलोमीटर दक्षिण-पूर्व में स्थित है। यहां सर्दियों में तापमान माइनस 20 डिग्री तक गिर जाता है, जिससे एयरबेस पर विशेष रखरखाव ढांचे की जरूरत पड़ती है। इसे करीब ₹218 करोड़ की लागत से बनाया गया है। मुध-न्योमा नाम बेस के पास स्थित मुध गांव से लिया गया है। लद्दाख में वायुसेना का चौथा एयरबेस न्योमा लद्दाख में वायुसेना का चौथा बेस है। बाकी एयरबेस लेह, कारगिल और थोईस में हैं। इनमें कारगिल एयरबेस लगभग 10,500 फीट पर स्थित है। इसके अलावा भारतीय वायुसेना स्पेशल ऑपरेशन एयरक्राफ्ट और हेलिकॉप्टरों के लिए उत्तरी लद्दाख में शित्थि दौलत बेग ओल्डी में मिट्टी से बने रनवे का इस्तेमाल करती है। -------------------- ये खबर भी पढ़ें… DRDO के एडवांस्ड हाई-एल्टीट्यूड पैराशूट का पहला लाइव जंप: 16000 फीट की ऊंचाई से कूदे जवान; यहां हवा की कमी, इसलिए पैराशूट कंट्रोल करना चुनौती DRDO ने अक्टूबर में लद्दाख के न्योमा में एडवांस्ड हाई एल्टीट्यूड पैराशूट का पहला लाइव जंप किया। पैराट्रूपर्स ने 16,000 फीट की ऊंचाई से छलांग लगाई। पैराशूट 15,500 फीट पर खुला और जवानों ने ड्रॉप जोन में सुरक्षित लैंडिंग की। यह ऊंचाई वाले इलाकों में पैराट्रूपर्स को बड़ी संख्या में उतारने वाला स्टैटिक लाइन पैराशूट सिस्टम है। यह जंप लद्दाख में न्योमा ड्रॉप जोन में की गई, जो दुनिया के सबसे ऊंचे ड्रॉप जोन में से एक है। पढ़ें पूरी खबर…

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