चुनाव आयोग अधिकारी पर कामकाज में दखल देने का आरोप:सुखबीर संधू और विवेक जोशी ने कैबिनेट सचिव से शिकायत की थी, कार्रवाई नहीं हुई

Oct 23, 2026 - 07:12
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चुनाव आयोग अधिकारी पर कामकाज में दखल देने का आरोप:सुखबीर संधू और विवेक जोशी ने कैबिनेट सचिव से शिकायत की थी, कार्रवाई नहीं हुई
दिल्ली में सूचना के अधिकार (RTI) से मिली जानकारी के मुताबिक, कैबिनेट सचिवालय ने चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी की शिकायत पर वरिष्ठ उप चुनाव आयुक्त मनीष गर्ग के खिलाफ कार्रवाई नहीं की। दोनों आयुक्तों ने 29 जुलाई को कैबिनेट सचिव टीवी सोमनाथन को अलग-अलग पत्र लिखकर गर्ग के कामकाज पर सवाल उठाए थे। हालांकि, कैबिनेट सचिवालय का मानना था कि ये पत्र पूरे चुनाव आयोग की आधिकारिक शिकायत नहीं थे। ऐसे में कार्रवाई करना संवैधानिक संस्था के काम में दखल माना जा सकता था। RTI कार्यकर्ता और रिटायर्ड कमोडोर लोकेश के. बत्रा को मिले जवाब से यह जानकारी सामने आई है। गर्ग को 2 सितंबर 2024 को कैबिनेट की नियुक्ति समिति (ACC) के जरिए चुनाव आयोग में तैनात किया गया था। शिकायतों में आरोप लगाया गया कि उन्होंने आयोग के वरिष्ठ अधिकारियों के कामकाज में बदलाव करने का आदेश जारी किया, जबकि इस बारे में न तो आयोग से चर्चा की गई और न ही संबंधित अधिकारियों की मंजूरी ली गई। पूरा मामला समझें सितंबर में द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, दोनों चुनाव आयुक्तों ने कैबिनेट सचिव को तब लेटर लिखे, जब चुनाव आयोग में अधिकारियों के बीच काम बांटने का एक आदेश जारी किया गया था। इसमें वोटर लिस्ट में नाम जोड़ने, हटाने और रिकॉर्ड अपडेट करने से जुड़ी शक्तियां राज्य स्तर के अधिकारियों के बजाय केंद्रीय स्तर पर केंद्रित होने की आशंका जताई गई थी। 26 सितंबर को चुनाव आयोग ने बयान जारी कर कहा था कि संबंधित अधिकारी का काम बांटने वाला आदेश सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी के निर्देश के बाद लागू नहीं किया गया। आयोग ने यह भी स्पष्ट किया था कि दोनों आयुक्तों के पत्र अधिकारी की प्रतिनियुक्ति से जुड़े थे, न कि नीति या IT डिवीजन के मामलों से। मनीष गर्ग पर लगाए गए आरोप कैबिनेट सचिवालय के रिकॉर्ड में शामिल नोट के मुताबिक, दोनों आयुक्तों ने आरोप लगाया कि गर्ग ने उप चुनाव आयुक्त के लिंक अधिकारी का पद संभालने के बाद काम बांटने का आदेश जारी किया था। इसमें वरिष्ठ उप चुनाव आयुक्तों, उप चुनाव आयुक्तों, महानिदेशकों और समान पदों पर तैनात अधिकारियों के काम में बदलाव किया गया था। यह आदेश आयोग या संबंधित अधिकारियों से चर्चा किए बिना जारी किया गया। अधिकारियों को मौखिक और लिखित निर्देश दिए गए थे कि आयोग की पहले से चर्चा या मंजूरी के बिना ऐसे बदलाव नहीं किए जाएं। जब विवेक जोशी ने इस मामले से जुड़ी प्रशासनिक फाइल मांगी, तो उन्हें फाइल उपलब्ध नहीं कराई गई। दोनों आयुक्तों ने इन कदमों को स्थापित प्रक्रिया के खिलाफ बताते हुए मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023 का उल्लंघन बताया। कैबिनेट सचिवालय ने नहीं की कार्रवाई 3 अगस्त को तैयार कैबिनेट नोट में सुझाव दिया गया था कि इस मामले पर मुख्य चुनाव आयुक्त की राय ली जा सकती है। इसके लिए एक मसौदा पत्र भी मंजूरी के लिए तैयार किया गया था। हालांकि, अगले दिन तैयार एक अन्य नोट में कहा गया कि दोनों आयुक्तों की शिकायत को पूरे चुनाव आयोग की आधिकारिक सूचना नहीं माना जा सकता। नोट के मुताबिक, चुनाव आयोग एक संवैधानिक संस्था है, जिसे कार्यपालिका के हस्तक्षेप से स्वतंत्र रखा गया है, ताकि वह स्वतंत्र और पारदर्शी तरीके से काम कर सके। कैबिनेट सचिवालय का कहना था कि दोनों आयुक्तों के पत्रों को गंभीरता से लिया जाना चाहिए, लेकिन इन्हें पूरे आयोग की औपचारिक शिकायत मानकर कार्रवाई करना उचित नहीं होगा। ऐसा करने से आयोग के कामकाज में दखल देने का सवाल उठ सकता था। कानून और आयोग के नियमों का दिया हवाला कैबिनेट नोट में मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023 की धारा 18 का भी जिक्र किया गया। इसके मुताबिक, आयोग को जहां तक संभव हो, सर्वसम्मति से काम करना चाहिए। अगर किसी मुद्दे पर मतभेद होता है, तो फैसला बहुमत से लिया जाता है। नोट में कहा गया कि मनीष गर्ग की नियुक्ति कैबिनेट की नियुक्ति समिति ने की थी, लेकिन अब वह चुनाव आयोग के अधिकारी हैं। इसलिए उनके कामकाज और आचरण की निगरानी चुनाव आयोग के नियमों और दिशानिर्देशों के तहत होनी चाहिए। कैबिनेट सचिवालय ने माना कि शिकायतों पर उचित ध्यान देना जरूरी है, लेकिन पूरे आयोग की आधिकारिक सूचना के बिना इस स्तर पर कार्रवाई करना अनुचित हो सकता है। शिकायतों का रिकॉर्ड रखने का फैसला कैबिनेट सचिव टीवी सोमनाथन ने 5 अगस्त 2026 को दोनों पत्र मिलने की पुष्टि की थी। इन पत्रों की प्रतियां कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT), स्थापना अधिकारी और मुख्य चुनाव आयुक्त के कार्यालय को भेजी गई थीं। कैबिनेट सचिव के हस्ताक्षर वाले नोट में कहा गया कि शिकायतों को रिकॉर्ड पर रखा जाए, ताकि भविष्य में संबंधित अधिकारी के बारे में कोई फैसला लेते समय इन पर विचार किया जा सके। दोनों चुनाव आयुक्तों को भी स्वीकृति पत्र की प्रति भेजी गई थी।

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