2027-28 तक आएगा ब्रह्मोस-NG का प्रोटोटाइप:ब्रह्मोस चीफ बोले- 1500km की रेंज रोडमैप में शामिल; इसकी शुरुआती रेंज 290km थी

Oct 22, 2026 - 17:08
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2027-28 तक आएगा ब्रह्मोस-NG का प्रोटोटाइप:ब्रह्मोस चीफ बोले- 1500km की रेंज रोडमैप में शामिल; इसकी शुरुआती रेंज 290km थी
ब्रह्मोस एयरोस्पेस 2027-2028 तक ब्रह्मोस-नेक्स्ट जेनरेशन (NG) पहला प्रोटोटाइप तैयार कर सकता है। 1500 किमी रेंज वाली मिसाइल अभी भविष्य की योजना में है। यह फिलहाल कॉन्सेप्चुअल स्टेज पर है। कंपनी के सीईओ और मैनेजिंग डायरेक्टर डॉ. जयतीर्थ जोशी ने ANI को दिए इंटरव्यू में बताया कि मिसाइल अपनी शुरुआती 290 किमी स्ट्राइक रेंज से आगे की क्षमता दिखा चुकी है। ब्रह्मोस-NG पर काम चल रहा है। इसमें ज्यादा स्वदेशी सामग्री, नई तकनीक और एडवांस्ड मटेरियल का इस्तेमाल होगा। इसके लिए बड़े लेवल पर रिसर्च और डेवलपमेंट की जरूरत होगी। डॉ. जोशी ने कहा कि कंपनी ने अपनी योजनाएं तय कर ली हैं और इस दिशा में लगातार आगे बढ़ रही है। विदेशी देशों की एयर-लॉन्च्ड ब्रह्मोस में रुचि डॉ. जोशी ने बताया कि कुछ देशों ने एयर-लॉन्च्ड ब्रह्मोस को अपनी एयरफोर्स में शामिल करने में रुचि दिखाई है। इन देशों के पास सुखोई-30 विमान मौजूद हैं। उन्होंने कहा कि कुछ देशों ने ब्रह्मोस-एनजी में भी रुचि दिखाई है। इस मिसाइल को पहले एयरबोर्न कॉन्फिगरेशन में विकसित किया जाएगा। कंपनी सभी इच्छुक पक्षों से बातचीत कर रही है। उन्होंने कहा, “हां, कुछ देशों ने अपनी एयरफोर्स के लिए एयर-लॉन्च्ड ब्रह्मोस में रुचि दिखाई है। इन देशों के पास सुखोई-30 विमान हैं। इसके अलावा, कुछ देशों ने ब्रह्मोस-एनजी की इच्छा भी जताई है, जिसे पहले एयरबोर्न कॉन्फिगरेशन में विकसित किया जाएगा। हम सभी इच्छुक पक्षों से बातचीत कर रहे हैं।” ऑपरेशन में प्रदर्शन के बाद बढ़ी दिलचस्पी डॉ. जोशी के मुताबिक, मिसाइल के युद्ध में प्रदर्शन के बाद विदेशी सेनाओं की इसके ऑपरेशनल और फंक्शनल पैरामीटर्स में दिलचस्पी बढ़ी है। उन्होंने कहा कि सेनाएं ऐसा अत्याधुनिक सिस्टम चाहती हैं, जो तेजी से बदलते युद्ध के माहौल के अनुसार खुद को ढाल सके। डॉ. जोशी ने कहा कि ब्रह्मोस एक बेहद आधुनिक हथियार है। यह समय के साथ विकसित हो रहा है और इसने अपने प्रदर्शन की क्षमता साबित की है। उन्होंने बताया कि पिछले साल पूरे युद्ध अभियान के दौरान मिसाइल ने दुश्मन के ठिकानों पर सटीक निशाना लगाया। इस दौरान एक भी मिसाइल इंटरसेप्ट नहीं हुई। उन्होंने कहा, “मिसाइल की इन खूबियों से प्रभावित होकर विदेशी सेनाएं ब्रह्मोस, इसके ऑपरेशनल और फंक्शनल पैरामीटर्स सहित अन्य पहलुओं के बारे में और ज्यादा जानकारी मांग रही हैं।” अगले पांच साल की प्राथमिकताएं अगले पांच वर्षों के लक्ष्यों पर डॉ. जोशी ने कहा कि कंपनी की तत्काल और लंबी अवधि की प्राथमिकताओं में सशस्त्र बलों के मौजूदा ऑर्डर पूरे करना शामिल है। इसके साथ ही रिसर्च और डेवलपमेंट तेज करना और सिस्टम व सब-सिस्टम की सप्लाई करने वाले इंडस्ट्री पार्टनर्स की संख्या बढ़ाना भी लक्ष्य है। उन्होंने कहा कि हैदराबाद, नागपुर, पिलानी और लखनऊ में कंपनी की सभी प्रोडक्शन यूनिट्स इस दिशा में पूरी क्षमता से काम कर रही हैं। लखनऊ कंपनी की सबसे नई यूनिट है। कंपनी अगली पीढ़ी की ब्रह्मोस के विकास और टेस्टिंग के लिए जरूरी खास तकनीकों पर काम करने वाले ‘टेक-ब्रिक्स’ स्थापित करके RD तेज करना चाहती है। डॉ. जोशी ने कहा कि बढ़ती मांग और किसी भी स्थिति में उत्पादन क्षमता बढ़ाने के लिए सप्लाई चेन मजबूत की जाएगी। पहले हर सिस्टम या सब-सिस्टम के लिए 1-2 इंडस्ट्री पार्टनर्स थे। अब कंपनी 45 सप्लायर्स विकसित करना चाहती है। उन्होंने कहा कि इससे गुणवत्ता और कीमत के मामले में प्रतिस्पर्धा बढ़ाने में भी मदद मिलेगी। भारत के रक्षा निर्यात में ब्रह्मोस की भूमिका डॉ. जोशी ने कहा कि मिसाइल के युद्ध प्रदर्शन का भारत के रक्षा निर्यात पर असर पड़ा है। उनके मुताबिक, ब्रह्मोस भारत की रक्षा क्षमता और आत्मनिर्भरता का प्रतीक बन चुकी है। उन्होंने कहा, “ब्रह्मोस अब सिर्फ एक मिसाइल नहीं है। यह आत्मविश्वास से भरे और आत्मनिर्भर नए भारत की ताकत, सटीकता और गर्व है।” ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय सशस्त्र बलों ने पहली बार इस हथियार प्रणाली का सक्रिय युद्ध में इस्तेमाल किया। सशस्त्र बलों ने पाकिस्तान के प्रमुख एयरबेस, नूर खान सहित कई अहम ठिकानों को निशाना बनाया। इससे इस हथियार प्रणाली की ताकत सामने आई। ब्रह्मोस सिस्टम भारत के रक्षा निर्यात का भी अहम आधार है। भारत का रक्षा निर्यात 38,400 करोड़ रुपए तक पहुंच चुका है। इसमें सालाना 62.7% की वृद्धि दर्ज की गई है। भारतीय नौसेना के लिए नया अनुबंध इस बीच, 6 अक्टूबर को रक्षा मंत्रालय ने भारतीय नौसेना के जहाजों के लिए ब्रह्मोस फायर कंट्रोल सिस्टम और लॉन्चर्स की खरीद का अनुबंध ब्रह्मोस एयरोस्पेस के साथ किया। इस प्रोजेक्ट में कम से कम 68% स्वदेशी सामग्री होगी। इससे MSME समेत कई भारतीय उद्योगों की सक्रिय भागीदारी को बढ़ावा मिलेगा।

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