जर्मनी में फंसी अहमदाबाद की 5 साल की बच्ची:7 महीने की उम्र में माता-पिता से अलग हुई; क्या अरिहा को वापस ला पाएंगे अमित शाह
गुजरात की रहने वाली अरिहा को 7 महीने की उम्र में जर्मनी की चाइल्ड सर्विसेज अपने साथ ले गई थी। अब अरिहा 5 साल की हो चुकी है और अपने माता-पिता के बिना रह रही है। वह अब तक भारत नहीं लौट पाई है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने 17 अक्टूबर को अहमदाबाद के पालडी में जैनाचार्य गच्छाधिपति उदयप्रभ सूरीश्वरजी महाराज साहेब से मुलाकात कर उनका आशीर्वाद लिया। दोनों के बीच करीब 20 मिनट तक बातचीत हुई। इस दौरान जर्मनी में रह रही अहमदाबाद के जैन परिवार की बेटी अरिहा का मुद्दा भी उठा। अमित शाह ने अरिहा को वापस लाने का वादा किया। आखिर अरिहा जर्मनी में क्यों है? पीएम नरेंद्र मोदी के प्रयासों के बावजूद जर्मनी उसे भारत को क्यों नहीं सौंप रहा है? उसे वापस लाने में आगे क्या चुनौतियां हैं? आइए, समझते हैं… सवाल-1: पूरा मामला क्या है? जवाब: अहमदाबाद के रहने वाले भावेश शाह आईटी प्रोफेशनल हैं। वे अगस्त 2018 में पत्नी धारा शाह के साथ जर्मनी गए थे। दोनों वहां बसने की कोशिश कर रहे थे। इसी दौरान धारा की डिलीवरी का समय आया, लेकिन कोरोना महामारी के कारण वे भारत नहीं लौट सकीं। फरवरी 2021 में जर्मनी में उनकी बेटी अरिहा का जन्म हुआ। भावेश और धारा जर्मनी में स्थायी रूप से नहीं रहना चाहते थे। उनकी योजना कुछ साल बाद भारत लौटने की थी। इसलिए उन्होंने अरिहा का भारतीय पासपोर्ट बनवाया। कुछ समय बाद अरिहा के दादा-दादी भी उससे मिलने जर्मनी पहुंचे। एक दिन दादी अरिहा के साथ खेल रही थीं, तभी उन्होंने उसके प्राइवेट पार्ट के पास खून देखा। वे घबरा गईं, लेकिन उन्होंने घर में किसी को इसकी जानकारी नहीं दी। करीब एक हफ्ते बाद दोबारा खून निकलने की घटना हुई। धारा शाह 17 सितंबर 2021 को अरिहा का डायपर बदल रही थीं। इस दौरान उन्हें उसके प्राइवेट पार्ट के पास खून दिखा। वे पति के साथ तुरंत बच्ची को अस्पताल ले गईं। एक बाल रोग विशेषज्ञ समेत 4-5 डॉक्टरों ने उसकी जांच की। डॉक्टरों ने कहा कि चिंता की कोई बात नहीं है और यह हार्मोनल ब्लीडिंग है। इसके बावजूद माता-पिता की चिंता बनी रही। इसलिए 21 सितंबर 2021 को वे फिर अस्पताल पहुंचे। धारा शाह सुबह 11 बजे अस्पताल पहुंचीं। शाम करीब 7 बजे डॉक्टर अरिहा को इलाज के लिए अंदर ले गए। डॉक्टर ने बताया कि बच्ची के प्राइवेट पार्ट के बाहरी हिस्से में चोट है और टांके लगाने पड़ सकते हैं। इस पर धारा शाह उलझन में पड़ गईं। एक महिला सर्जन ने कहा कि टांके लगाने की जरूरत नहीं है, जबकि दूसरे डॉक्टर ने टांके लगाने की सलाह दी। दोनों की अलग-अलग राय सुनकर धारा ने पति भावेश शाह को फोन किया। उन्होंने कहा कि वे अस्पताल आकर डॉक्टर से बात करेंगे। नर्स ने बताया कि डॉक्टर सुबह मिलेंगे, इसलिए धारा को रात में अस्पताल में रुकना होगा। 22 सितंबर को भावेश और धारा डॉक्टर से मिलने पहुंचे। उस समय एक नर्स अरिहा की देखभाल कर रही थी। यहीं से मामला बदल गया। जब अरिहा के माता-पिता डॉक्टरों से मिलने पहुंचे, तो वहां दो टीमें मौजूद थीं। एक डॉक्टरों की और दूसरी चाइल्ड सर्विसेज की थी। यह संस्था बच्चों की देखभाल और सुरक्षा से जुड़े मामलों को देखती है। चाइल्ड सर्विसेज के अधिकारियों को जर्मन भाषा आती थी। अरिहा के माता-पिता ने गुजराती या हिंदी अनुवादक मांगा, लेकिन अस्पताल ने उन्हें उर्दू-पंजाबी जानने वाला पाकिस्तानी ट्रांसलेटर दिया। आरोप है कि इससे बातचीत में गलतफहमी हुई। माता-पिता कुछ कहते थे, लेकिन ट्रांसलेटर उसका अलग मतलब बताता था। डॉक्टरों ने कहा कि मामले में पुलिस को भी शामिल करना पड़ेगा। इसके बाद डॉक्टरों ने माता-पिता से पूछा कि बच्ची के प्राइवेट पार्ट में चोट कैसे लगी। उस समय अरिहा 7 महीने की थी और चीजों को पकड़कर खड़े होने की कोशिश करती थी। माता-पिता ने आशंका जताई कि डायपर के बिना खेलते समय वह किसी खिलौने या दूसरी चीज पर बैठ गई होगी। धारा शाह ने डॉक्टरों से पूछा कि क्या बच्ची ठीक है। डॉक्टरों ने कहा कि वह ठीक है, लेकिन उन्हें अस्पताल में रुकना होगा। धारा दूसरी रात भी अरिहा के साथ अस्पताल में रहीं। 23 सितंबर को धारा और भावेश शाह फिर डॉक्टरों से मिलने पहुंचे। डॉक्टरों ने बताया कि अरिहा की हालत ठीक है और उसे अस्पताल से छुट्टी दी जा रही है, लेकिन वह माता-पिता के साथ घर नहीं जा सकती। उसे फोस्टर केयर में भेजा जाएगा। फोस्टर केयर ऐसी व्यवस्था है, जिसमें बच्चे की देखभाल माता-पिता से अलग की जाती है। जब अरिहा नर्स के पास थी, तब चाइल्ड सर्विसेज के अधिकारी उसे लेकर जा चुके थे। इसके बाद से उसके माता-पिता की मुश्किलें शुरू हो गईं। सवाल-2: जर्मनी में अरिहा के माता-पिता को किन समस्याओं का सामना करना पड़ा? जवाब: चाइल्ड सर्विसेज के अधिकारी 7 महीने की अरिहा को अपने साथ ले गए। माता-पिता का आरोप है कि उन्हें इसकी जानकारी नहीं दी गई और न ही उनसे पूछा गया। जब उन्होंने डॉक्टरों से पूछा कि बच्ची को उनके साथ क्यों नहीं भेजा गया, तो डॉक्टरों ने कहा कि मेडिकल रिपोर्ट आने तक वे कुछ नहीं बता सकते। भावेश और धारा शाह के लिए यह बड़ा झटका था। अरिहा मां का दूध पीती थी। उन्हें चिंता थी कि बच्ची की देखभाल कौन करेगा। इसके बाद उन्होंने स्थानीय यूनियन से मदद मांगी। वहां उन्हें भारतीय दूतावास को जानकारी देने और जरूरत पड़ने पर एडवोकेट करने की सलाह मिली। माता-पिता ने एडवोकेट किया। चार दिन बाद एडवोकेट ने उन्हें बताया कि डॉक्टरों को शक है कि उन्होंने बच्ची का यौन शोषण किया है। इसी वजह से अरिहा को उनके साथ नहीं भेजा जा सकता। करीब तीन महीने बाद मेडिकल रिपोर्ट आई। माता-पिता के मुताबिक, अस्पताल के डॉक्टरों ने चाइल्ड सर्विसेज को अलग रिपोर्ट दी थी, जिसमें कहा गया था कि बच्ची के साथ यौन शोषण नहीं हुआ। इससे बच्ची को फोस्टर केयर में भेजने के आधार पर सवाल उठने लगे। पुलिस ने भी जांच बंद कर दी और मामला अदालत तक नहीं पहुंचा। माता-पिता को उम्मीद थी कि अब उन्हें बेटी वापस मिल जाएगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इसके बाद अरिहा के माता-पिता ने उन दूसरे परिवारों से संपर्क किया, जिनके बच्चों को चाइल्ड सर्विसेज ने अपने संरक्षण में लिया था। इन परिवारों ने उन्हें मेडिकल रिपोर्ट हासिल करने की सलाह दी। काफी कोशिशों के बाद नवंबर 2022 में करीब 13 महीने बाद उन्हें रिपोर्ट मिली। माता-पिता ने यह रिपोर्ट भारत और अमेरिका के डॉक्टरों को दिखाई। उनके मुताबिक, डॉक्टरों ने बच्ची की जांच के तरीके पर सवाल उठाए। रिपोर्ट में वजाइनोस्कोपी, यूरेटेरोस्कोपी और सिस्टोस्कोपी जैसी जांचों का जिक्र था। माता-पिता का कहना है कि इतनी छोटी बच्ची की ये जांच क्यों की गईं और उनका क्या असर हुआ, इसकी जांच होनी चाहिए थी। इस बीच, जर्मनी की चाइल्ड सर्विसेज, जिसे वहां यूगेंडआम्ट कहा जाता है, ने माता-पिता के अधिकार खत्म करने की कानूनी प्रक्रिया जारी रखी। मामला फैमिली कोर्ट पहुंचा। अदालत ने भावेश और धारा शाह की मनोवैज्ञानिक जांच कराने का फैसला किया, ताकि पता चल सके कि वे बच्ची की देखभाल कर सकते हैं या नहीं। कोर्ट ने एक मनोवैज्ञानिक नियुक्त किया। उन्होंने माता-पिता से करीब 11 घंटे बातचीत की, लेकिन रिपोर्ट देने में एक साल लगा दिया। माता-पिता के मुताबिक, रिपोर्ट में उनकी मानसिक स्थिति सामान्य बताई गई थी। इसके बावजूद चाइल्ड सर्विसेज ने दलील दी कि अरिहा ने भारतीय संस्कृति में सिर्फ 7 महीने बिताए हैं और अब वह जर्मन संस्कृति में पल रही है। इसलिए उसे वहां से हटाना ठीक नहीं होगा और उसकी देखभाल चाइल्ड सर्विसेज की निगरानी में ही होनी चाहिए। अदालत की ओर से नियुक्त विशेषज्ञ ने माता-पिता के पक्ष में रिपोर्ट दी थी। उनके मुताबिक, अरिहा अपने माता-पिता से ज्यादा जुड़ी हुई थी। इसलिए उसके विकास के लिए निगरानी में उसे माता-पिता के साथ रहने देना चाहिए था। फरवरी-मार्च 2023 में कोर्ट में दो दिन तक करीब 10-10 घंटे सुनवाई हुई। माता-पिता के मुताबिक, इस दौरान जज ने उन्हें अरिहा की चोट के बारे में दलील देने की अनुमति नहीं दी। 13 जून 2023 को कोर्ट ने फैसला सुनाया। माता-पिता का आरोप है कि कोर्ट ने अपने नियुक्त विशेषज्ञ की राय नहीं मानी और अरिहा की कस्टडी चाइल्ड सर्विसेज को सौंप दी। सवाल-3: भारत सरकार ने अरिहा को वापस लाने के लिए क्या प्रयास किए? जवाब: अरिहा को भारत वापस लाने के लिए जैन समाज, भारत सरकार और विपक्षी दलों के नेताओं ने प्रयास किए हैं। दिसंबर 2022: विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने जर्मनी की विदेश मंत्री एनालेना बेयरबॉक के सामने अरिहा के मामले पर चिंता जताई। अगस्त 2023: भारत सरकार ने जर्मनी के राजदूत फिलिप एकरमैन को तलब किया। उस समय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अरिंदम बागची ने कहा था कि बच्ची को भारत की सांस्कृतिक, सामाजिक और धार्मिक पहचान से जुड़े माहौल में रहने का अवसर मिलना चाहिए। जनवरी 2026: जर्मनी के चांसलर फ्रेडरिक मर्ज के भारत दौरे के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी अरिहा का मुद्दा उठाया। जनवरी 2026: भारत के विदेश सचिव विक्रम मिसरी ने बताया कि भारत सरकार अरिहा शाह के मामले में जर्मनी के अधिकारियों के संपर्क में है। इसके अलावा, 19 राजनीतिक दलों के 59 सांसदों ने भी अरिहा के समर्थन में आवाज उठाई। सांसदों ने जर्मन राजदूत को पत्र लिखकर बच्ची को भारत वापस लाने का मुद्दा उठाया। महाराष्ट्र के तत्कालीन सीएम एकनाथ शिंदे ने भी विदेश मंत्री एस. जयशंकर को लेटर लिखकर अरिहा के मामले में सख्त कदम उठाने की मांग की थी। भारत सरकार लगातार प्रयास कर रही है, लेकिन अब तक अरिहा की वापसी नहीं हो सकी है। इस मामले में जर्मनी की चाइल्ड सर्विसेज की भूमिका और बच्ची को भारतीय संस्कृति से जुड़े माहौल में रखने का मुद्दा लगातार उठाया जाता रहा है। सवाल-4: जर्मनी की चाइल्ड सर्विसेज पर किन नियमों के उल्लंघन के आरोप हैं? जवाब: जर्मनी में चाइल्ड सर्विसेज को युगेंडआम्ट कहा जाता है। आरोप है कि चाइल्ड सर्विसेज सभी नियमों का उल्लंघन कर रही है। अरिहा की कस्टडी किसे दी जाए, यह तय करने का अधिकार जर्मन चाइल्ड सर्विसेज के पास है। फिलहाल जर्मनी में अरिहा के मामले में कोई सक्रिय कानूनी प्रक्रिया नहीं चल रही है, लेकिन चाइल्ड सर्विसेज की मनमानी जारी है। वे संयुक्त राष्ट्र के बाल अधिकार समझौते (UNCRC) का भी हवाला देते हैं। भारत और जर्मनी दोनों इस समझौते के पक्षकार हैं। इसमें बच्चों के अधिकारों और उनकी सांस्कृतिक पहचान के संरक्षण पर जोर दिया गया है। अरिहा के माता-पिता का कहना है कि उनकी बेटी को भारतीय संस्कृति से दूर रखकर इन अधिकारों की भावना के खिलाफ काम किया जा रहा है। जर्मनी में बच्चों को परिवार से अलग क्यों किया जाता है? जर्मनी में बच्चों की सुरक्षा के लिए चाइल्ड सर्विसेज और फोस्टर केयर की व्यवस्था है। अगर अधिकारियों को लगता है कि किसी बच्चे की सुरक्षा खतरे में है, तो उसे परिवार से अलग कर फोस्टर केयर में रखा जा सकता है। हालांकि, ऐसे फैसलों की कानूनी समीक्षा और परिवार के अधिकार भी जरूरी होते हैं। जर्मनी के इतिहास में नाजी शासन के दौरान बच्चों को उनके परिवारों से अलग किया गया था। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बने संविधान और कानूनों में बच्चों और परिवारों के अधिकारों की सुरक्षा पर जोर दिया गया। अरिहा के माता-पिता का दावा है कि जर्मनी में हर साल हजारों बच्चों को उनके परिवारों से अलग किया जाता है। इनमें बड़ी संख्या प्रवासी परिवारों के बच्चों की होती है। उन्होंने तुर्किये, रोमानिया और कोलंबिया के उन परिवारों के उदाहरण भी दिए, जिनके बच्चों को लेकर जर्मनी में विवाद हुए थे। उनका कहना है कि दूसरे देशों के लोगों और नेताओं के विरोध के बाद कुछ मामलों में बच्चों को उनके परिवारों को वापस सौंपा गया। वे चाहते हैं कि भारत सरकार भी अरिहा की वापसी के लिए ठोस कदम उठाए। इस मामले की तुलना फिल्म मिसेज चटर्जी वर्सेज नॉर्वे से भी की जाती है। यह फिल्म एक भारतीय मां की कहानी है, जो नॉर्वे में अपने बच्चों की कस्टडी वापस पाने के लिए संघर्ष करती है। हालांकि, फिल्म में दिखाए गए मामले और अरिहा के मामले की कानूनी परिस्थितियां अलग हो सकती हैं। अरिहा के माता-पिता का कहना है कि उन्हें अब भी अपनी बेटी के रहने की जगह और उसकी मौजूदा स्थिति के बारे में पर्याप्त जानकारी नहीं मिलती है। सवाल-5: अरिहा अभी कहां है और उसे भारत वापस लाने का रास्ता क्या है? जवाब: अरिहा के माता-पिता भावेश और धारा शाह का कहना है कि उन्हें नहीं बताया जाता कि उनकी बेटी कहां रह रही है। उनका आरोप है कि जर्मनी में भारतीय दूतावास को भी अरिहा की मौजूदा स्थिति की पूरी जानकारी नहीं दी जाती। शुरुआत में अरिहा को एक बुजुर्ग जर्मन महिला के पास रखा गया था। बाद में उसे एक चिल्ड्रन सेंटर में भेज दिया गया। माता-पिता का दावा है कि यह सेंटर मानसिक दिव्यांग बच्चों की देखभाल के लिए था। उन्होंने सवाल उठाया कि सामान्य बच्ची अरिहा को वहां क्यों रखा गया। उनके मुताबिक, उन्हें बताया गया कि बच्ची भारतीय संस्कृति से आती है। माता-पिता का आरोप है कि अलग-अलग कारण बताकर अरिहा को उनसे और भारतीय संस्कृति से दूर रखा जा रहा है। उनका कहना है कि बच्चे को सिर्फ खाना, कपड़े और रहने की जगह देना काफी नहीं है। उसके भावनात्मक विकास और परिवार से जुड़ाव का भी ध्यान रखना जरूरी है। अरिहा को मांसाहारी खाना खिलाने का आरोप अरिहा के माता-पिता जैन धर्म को मानते हैं। उनका कहना है कि वे मांस, मछली और अंडे नहीं खाते। उन्होंने फोस्टर केयर से भी अनुरोध किया था कि अरिहा को ये चीजें न दी जाएं। लेकिन उनके मुताबिक, उन्हें जवाब मिला कि बच्ची को ये चीजें दी जाएंगी, क्योंकि इनमें ज्यादा पोषण होता है। माता-पिता का कहना है कि बचपन के शुरुआती साल बच्चे के शारीरिक और मानसिक विकास के लिए बहुत महत्वपूर्ण होते हैं। उन्हें चिंता है कि इस दौरान अरिहा की भाषा, खानपान और रहन-सहन पूरी तरह जर्मन माहौल के अनुसार ढल रहा है। भारतीय परिवार के पास रखने की कोशिश, लेकिन शर्तें सख्त जर्मनी के अधिकारी कहते रहे हैं कि अरिहा को वहां रहने वाले किसी भारतीय परिवार के पास रखने की कोशिश की जा रही है। हालांकि, उसके माता-पिता का कहना है कि ऐसे परिवार के लिए कई सख्त शर्तें रखी गई हैं। उनके मुताबिक, परिवार की लगातार निगरानी होगी और उसकी निजी जिंदगी पर भी नियंत्रण रहेगा। पूरा परिवार एक साथ भारत नहीं जा सकेगा और परिवार की महिला सदस्य को नौकरी छोड़नी पड़ सकती है। रोजमर्रा की जिंदगी में भी यूगेंडआम्ट का दखल रहेगा। माता-पिता का मानना है कि इन शर्तों के कारण किसी भारतीय परिवार के लिए अरिहा की देखभाल करना मुश्किल हो जाएगा। फोस्टर केयर का खर्च भी माता-पिता से मांगा गया अरिहा के माता-पिता का कहना है कि जर्मनी की फोस्टर केयर व्यवस्था ने उन्हें सितंबर 2021 से जून 2024 तक का करीब 22 लाख रुपये का बिल भेजा था। उनके मुताबिक, इसमें हर महीने करीब 55 हजार रुपये का खर्च शामिल था। उनका दावा है कि अरिहा के 18 साल की होने तक उन्हें हर महीने यह रकम देनी पड़ सकती है। इसके अलावा, अदालत की ओर से नियुक्त विशेषज्ञ की रिपोर्ट, अनुवादक की फीस और प्रशासनिक खर्च के लिए करीब 16 लाख रुपये का अलग बिल भी भेजा गया है। माता-पिता का सवाल है कि जब अरिहा को उनसे अलग रखा गया है और वे उसकी देखभाल नहीं कर पा रहे हैं, तो उसकी देखभाल का इतना खर्च उनसे क्यों मांगा जा रहा है? अब आगे क्या होगा? अरिहा के माता-पिता का दावा है कि उनकी बेटी बर्लिन से दूर जर्मनी के एक गांव में रह रही है। वहां उसे जर्मन भाषा और संस्कृति के अनुसार पाला जा रहा है। हालांकि, यहां उपलब्ध जानकारी से उसकी मौजूदा जगह और स्थिति की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकती। अरिहा को भारत वापस लाना उसके माता-पिता और भारत सरकार, दोनों के लिए चुनौती बना हुआ है। इसके लिए भारत को जर्मनी के साथ कानूनी और कूटनीतिक स्तर पर प्रयास करने होंगे। जर्मनी में बच्चों की कस्टडी से जुड़े फैसले कानूनी प्रक्रिया के तहत लिए जाते हैं। ऐसे में भारत सरकार के प्रयासों के साथ जर्मनी के संबंधित अधिकारियों का सहयोग भी जरूरी है। 17 अक्टूबर को अहमदाबाद के पालडी में गृह मंत्री अमित शाह ने जैनाचार्य उदयप्रभ सूरीश्वरजी महाराज साहेब से मुलाकात की थी। इस दौरान अरिहा का मुद्दा भी उठा। रिपोर्ट के मुताबिक, दोनों के बीच करीब 8 मिनट तक इस मामले पर चर्चा हुई। अमित शाह ने कहा कि वे इस मामले की फाइलों पर नजर रख रहे हैं और गुजरात की बेटी को जल्द भारत वापस लाने का प्रयास करेंगे। उन्होंने जैन समाज को भरोसा दिलाया कि वे अरिहा की वापसी के लिए काम करेंगे। अब देखना होगा कि भारत सरकार के कानूनी और कूटनीतिक प्रयासों से अरिहा की भारत वापसी का रास्ता कब निकलता है। (नोट: यह घटनाक्रम अरिहा की मां धारा शाह की जैन मीडिया यूट्यूब चैनल से बातचीत पर आधारित है। इसमें लगाए गए आरोपों और दावों की स्वतंत्र पुष्टि जरूरी है।)
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